Monday, May 4, 2020

भूख बड़ी है

 मैने और मेरे मित्रों ने ये निर्णय किया कि बंगला रोड के किनारे पर लगी झुग्गियों के लोगों को भोजन दिया जाए |
कोरोना के चलते , लॉकडाउन ने जाने कितने लोगों को भोजन के लिए माँगने पर मजबूर कर दिया है| रोज सुबह घूमते मैं इसी रोड पर तीन दिन से यही देख रहा था | झुग्गियों से बच्चे सड़क पर आ जाते हैं | आते जाते वाहनों को हाथ हिलाकर भोजन मांगेते देख कर मेरा हृदये भर उठा था |
हमने एक संस्था से संपर्क किया, खाने का प्रबंध किया | आज सुबह ही हम टेंपो में खाना लादकर वहाँ पहुँचे|
ये रोड बहुत स्पेशल है | यहाँ पर घूमने वाला व्यक्ति मुश्किल से ही कुछ ग़लत काम करे| क्योकि उसे अपना दिन और जीवन का अंतिम दिन में अंतर कम होता दिखाई पड़ता है | इस रोड के एक तरफ पुराना कब्रिश्तान है, एक तरफ शमशान| सुबह टहलते टहलते, कोई ना कोई आख़िरी सलाम देता हुआ दिख ही जाता था| अपनी मृत्यु शैया से ऐसा कहता हुआ " अपना टाइम आएगा "
यहाँ की झुग्गी मे रहने वाली जाति सालों से यही है| सब पुरुष दाढ़ी वाले, जैसे पैदा ही दाढ़ी के साथ हुए थे | शायद ही किसी पुरुष या महिला ने साबुत कपड़ा पहना हो | शायद ही कोई बच्चा ऐसा हो , जिसने आवारा कुत्तों को नहलाया ना हो, या भीख ना माँगी हो |
तो आज जैसे ही गाड़ी झुग्गी कॉलोनी के पास रुका, भीड़ लगना शुरू हो गयी | जो बच्चे शमशान मे, कब्रिस्तान मे पैसे चुग्ने गये, वो ताबड़तोड़ दीवालें फाँद फाँद कर जमा होने लगे|
टेंपो ड्राइवर ने कहा "जब तक आप इनको खाना बाँटते हैं, मैं अपनी पेट पूजा कर लेता हूँ" ऐसा कह कर वो अपना टिफिन खोलने लगा |
कुछ झुग्गी बस्ती वाले लोग, हमारे पास आकर हाथ फैला रहे थे | एकदम आमादा, जैसे जीवन मे पहली बार उनको खाना मिलेगा|
हमनें बार बार कहा " लाइन में आओ, लाइन में आओ " | पुरुष, स्त्री, बच्चे सब एक भावसे सुने तो अनसुना किए जा रहे थे | शायद यही उन्होनें सीखा था कि जो ज़ोर से माँगे, उसे ही मिलेगा |
हमने कुछ बच्चों को खाने का पॅकेट दिया ही था मगर ये क्या देखा मैनें : उनके पिता अपने ही बच्चों से खाना छीन कर खाने लगे |
झगड़ा बढ़ने लगा और हर कोई लड़ रहा था | गाली गलोच का ही शोर था | बच्चो को थप्पड़ ही थप्पड़ पड़ रहे थे | हालात बेकाबू हो रही थे, एक अंतिम कसर बाकी थी | बच्चो ने टेंपो पर चारों तरफ से चढ़ना शुरू कर दिया | मेरे मित्र अशोक ने कहा "यहाँ से निकलते हैं, यहाँ भलाई नहीं है"
हमने जैसे तैसे कुछ पॅकेट और बाँटे और ड्राइवर को गाड़ी चलाने को बोला | तब तक ड्राइवर भोजन कर चुका था | उसने गाड़ी के दरवाजे के पास खड़े भोजन माँगते हुए आदमी धक्का दिया और  तृप्ति से उसने अपनी सीट पर जगाह बनाई |
जब गाड़ी चलने लगी, तो बस्ती वासीयो ने खींच खींच कर अपने बच्चों को उतारा |
गाड़ी चल दी थी | पीछे मुड़कर देखता हूँ कि कुछ आशा से भरे बूढ़े और बच्चे अभी भी चलती गाड़ी के पीछे चले आ रहे हैं |
अशोक ने कहा " भूख बड़ी है, कोई कोरोना नहीं"

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