मैने और मेरे मित्रों ने ये निर्णय किया कि बंगला रोड के किनारे पर लगी झुग्गियों के लोगों को भोजन दिया जाए |
कोरोना के चलते , लॉकडाउन ने जाने कितने लोगों को भोजन के लिए माँगने पर मजबूर कर दिया है| रोज सुबह घूमते मैं इसी रोड पर तीन दिन से यही देख रहा था | झुग्गियों से बच्चे सड़क पर आ जाते हैं | आते जाते वाहनों को हाथ हिलाकर भोजन मांगेते देख कर मेरा हृदये भर उठा था |
हमने एक संस्था से संपर्क किया, खाने का प्रबंध किया | आज सुबह ही हम टेंपो में खाना लादकर वहाँ पहुँचे|
ये रोड बहुत स्पेशल है | यहाँ पर घूमने वाला व्यक्ति मुश्किल से ही कुछ ग़लत काम करे| क्योकि उसे अपना दिन और जीवन का अंतिम दिन में अंतर कम होता दिखाई पड़ता है | इस रोड के एक तरफ पुराना कब्रिश्तान है, एक तरफ शमशान| सुबह टहलते टहलते, कोई ना कोई आख़िरी सलाम देता हुआ दिख ही जाता था| अपनी मृत्यु शैया से ऐसा कहता हुआ " अपना टाइम आएगा "
यहाँ की झुग्गी मे रहने वाली जाति सालों से यही है| सब पुरुष दाढ़ी वाले, जैसे पैदा ही दाढ़ी के साथ हुए थे | शायद ही किसी पुरुष या महिला ने साबुत कपड़ा पहना हो | शायद ही कोई बच्चा ऐसा हो , जिसने आवारा कुत्तों को नहलाया ना हो, या भीख ना माँगी हो |
तो आज जैसे ही गाड़ी झुग्गी कॉलोनी के पास रुका, भीड़ लगना शुरू हो गयी | जो बच्चे शमशान मे, कब्रिस्तान मे पैसे चुग्ने गये, वो ताबड़तोड़ दीवालें फाँद फाँद कर जमा होने लगे|
टेंपो ड्राइवर ने कहा "जब तक आप इनको खाना बाँटते हैं, मैं अपनी पेट पूजा कर लेता हूँ" ऐसा कह कर वो अपना टिफिन खोलने लगा |
कुछ झुग्गी बस्ती वाले लोग, हमारे पास आकर हाथ फैला रहे थे | एकदम आमादा, जैसे जीवन मे पहली बार उनको खाना मिलेगा|
हमनें बार बार कहा " लाइन में आओ, लाइन में आओ " | पुरुष, स्त्री, बच्चे सब एक भावसे सुने तो अनसुना किए जा रहे थे | शायद यही उन्होनें सीखा था कि जो ज़ोर से माँगे, उसे ही मिलेगा |
हमने कुछ बच्चों को खाने का पॅकेट दिया ही था मगर ये क्या देखा मैनें : उनके पिता अपने ही बच्चों से खाना छीन कर खाने लगे |
झगड़ा बढ़ने लगा और हर कोई लड़ रहा था | गाली गलोच का ही शोर था | बच्चो को थप्पड़ ही थप्पड़ पड़ रहे थे | हालात बेकाबू हो रही थे, एक अंतिम कसर बाकी थी | बच्चो ने टेंपो पर चारों तरफ से चढ़ना शुरू कर दिया | मेरे मित्र अशोक ने कहा "यहाँ से निकलते हैं, यहाँ भलाई नहीं है"
हमने जैसे तैसे कुछ पॅकेट और बाँटे और ड्राइवर को गाड़ी चलाने को बोला | तब तक ड्राइवर भोजन कर चुका था | उसने गाड़ी के दरवाजे के पास खड़े भोजन माँगते हुए आदमी धक्का दिया और तृप्ति से उसने अपनी सीट पर जगाह बनाई |
जब गाड़ी चलने लगी, तो बस्ती वासीयो ने खींच खींच कर अपने बच्चों को उतारा |
गाड़ी चल दी थी | पीछे मुड़कर देखता हूँ कि कुछ आशा से भरे बूढ़े और बच्चे अभी भी चलती गाड़ी के पीछे चले आ रहे हैं |
अशोक ने कहा " भूख बड़ी है, कोई कोरोना नहीं"
कोरोना के चलते , लॉकडाउन ने जाने कितने लोगों को भोजन के लिए माँगने पर मजबूर कर दिया है| रोज सुबह घूमते मैं इसी रोड पर तीन दिन से यही देख रहा था | झुग्गियों से बच्चे सड़क पर आ जाते हैं | आते जाते वाहनों को हाथ हिलाकर भोजन मांगेते देख कर मेरा हृदये भर उठा था |
हमने एक संस्था से संपर्क किया, खाने का प्रबंध किया | आज सुबह ही हम टेंपो में खाना लादकर वहाँ पहुँचे|
ये रोड बहुत स्पेशल है | यहाँ पर घूमने वाला व्यक्ति मुश्किल से ही कुछ ग़लत काम करे| क्योकि उसे अपना दिन और जीवन का अंतिम दिन में अंतर कम होता दिखाई पड़ता है | इस रोड के एक तरफ पुराना कब्रिश्तान है, एक तरफ शमशान| सुबह टहलते टहलते, कोई ना कोई आख़िरी सलाम देता हुआ दिख ही जाता था| अपनी मृत्यु शैया से ऐसा कहता हुआ " अपना टाइम आएगा "
यहाँ की झुग्गी मे रहने वाली जाति सालों से यही है| सब पुरुष दाढ़ी वाले, जैसे पैदा ही दाढ़ी के साथ हुए थे | शायद ही किसी पुरुष या महिला ने साबुत कपड़ा पहना हो | शायद ही कोई बच्चा ऐसा हो , जिसने आवारा कुत्तों को नहलाया ना हो, या भीख ना माँगी हो |
तो आज जैसे ही गाड़ी झुग्गी कॉलोनी के पास रुका, भीड़ लगना शुरू हो गयी | जो बच्चे शमशान मे, कब्रिस्तान मे पैसे चुग्ने गये, वो ताबड़तोड़ दीवालें फाँद फाँद कर जमा होने लगे|
टेंपो ड्राइवर ने कहा "जब तक आप इनको खाना बाँटते हैं, मैं अपनी पेट पूजा कर लेता हूँ" ऐसा कह कर वो अपना टिफिन खोलने लगा |
कुछ झुग्गी बस्ती वाले लोग, हमारे पास आकर हाथ फैला रहे थे | एकदम आमादा, जैसे जीवन मे पहली बार उनको खाना मिलेगा|
हमनें बार बार कहा " लाइन में आओ, लाइन में आओ " | पुरुष, स्त्री, बच्चे सब एक भावसे सुने तो अनसुना किए जा रहे थे | शायद यही उन्होनें सीखा था कि जो ज़ोर से माँगे, उसे ही मिलेगा |
हमने कुछ बच्चों को खाने का पॅकेट दिया ही था मगर ये क्या देखा मैनें : उनके पिता अपने ही बच्चों से खाना छीन कर खाने लगे |
झगड़ा बढ़ने लगा और हर कोई लड़ रहा था | गाली गलोच का ही शोर था | बच्चो को थप्पड़ ही थप्पड़ पड़ रहे थे | हालात बेकाबू हो रही थे, एक अंतिम कसर बाकी थी | बच्चो ने टेंपो पर चारों तरफ से चढ़ना शुरू कर दिया | मेरे मित्र अशोक ने कहा "यहाँ से निकलते हैं, यहाँ भलाई नहीं है"
हमने जैसे तैसे कुछ पॅकेट और बाँटे और ड्राइवर को गाड़ी चलाने को बोला | तब तक ड्राइवर भोजन कर चुका था | उसने गाड़ी के दरवाजे के पास खड़े भोजन माँगते हुए आदमी धक्का दिया और तृप्ति से उसने अपनी सीट पर जगाह बनाई |
जब गाड़ी चलने लगी, तो बस्ती वासीयो ने खींच खींच कर अपने बच्चों को उतारा |
गाड़ी चल दी थी | पीछे मुड़कर देखता हूँ कि कुछ आशा से भरे बूढ़े और बच्चे अभी भी चलती गाड़ी के पीछे चले आ रहे हैं |
अशोक ने कहा " भूख बड़ी है, कोई कोरोना नहीं"
Bilkul sahi kaha aapne. Loved the line "bhukh badi hai Corona nahi"
ReplyDeleteNice one sir
ReplyDeleteTruth of life!! Very interestingly penned down...
ReplyDeleteVery nice....
ReplyDeleteVery true..
ReplyDeleteBut kal k incident k baad pyas bhi badi h