दबिश 1
सुबह के चार बजे हैं। मैं डरा हुआ हूँ की जो पिछले दिन घटना में मेरी कार गुजारी के परिणाम क्षण क्षण मेरे निकट आ रहे हैं। मैं सोने के पर्यत्न में पिछले चार घंटे व्यतीत कर चुका हूँ।
पल पल लगता है की या तो विरोधी ग्रुप या फिर पुलिस , कोई तो धर पकड़ करने को मेरे निकट आ रहे हैं।
उनकी शक्लें कैसी होंगी, या वो कितने आक्रामक होंगे। ऐसे विचार करते करते, अनायास ही मन में पिस्टोल की पकड़ अनुभव करता हूँ और प्रतिकृया मेरी कैसी रहेगी यही सोच रहा हूँ।
सोचा थोड़ा टहल लेता हूँ। शायद थकान नहीं है तो नींद नहीं है। कमरे से बाहर बाल्कनी में आने पर देखता हूँ की माँ के हाथ मे बाल्टी है और बाल्टी की वही आवाज है जो पिछले दसियो वर्षों से है।
मेरे महल जैसे घर को बनाने की पहली शर्त यही थी की इसमें गाय भेंस का बाड़ा हो। ठीक सामने गायें पुंछ हिलाती दिख सकती हैं। बस यही चित्त को शांत अनुभूति दे रहा हैं।
ये देख कर मैं वापस कमरे के बिस्तर पर लेता ही था, की दन दनाते कदमों की आवाज और फिर दरवाजा तोड़ने की आवाज ने दिल दहला दिया। मैं फिर उठा और देखा की वर्दी धारी पूरी योजना के साथ आए हैं। सीधे सीडियाँ चढ़ते चढ़ते ऊपर आ रहे हैं। जैसे घर का नक्शा उन्हे पहले ही मालूम हो।
इस घर मे मेरे प्रति ये तीसरी दबिश हैं। पहली दोनों दबिश पुराने घर की थी।
चीख चिल्ला कर मुझे पकड़ कर मुझे आगे की तरफ धकेलते हुए वो सीढ़िया उतरवाने लगे।
मैं कोई विरोध मे नहीं हूँ, और आराम से उनके साथ जाने को तयार हूँ। फिर भी वो अपनी आदत से मजबूर और मैं अपनी आदत से मजबूर।
माँ अभी भी गायों का दूध दोह रही हैं, और एक पल के लिए पल्ला संभालते हुए मुझे उन्होने देखा और फिर अपने काम मे लगन लगा ली। वो अपनी आदत से मजबूर हैं।
एक अपराधी का एक दार्शनिक जैसी दृष्टि होना बेमेल ही नहीं अपितु बेहद खरनाक भी है।
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